रविवार, 31 जुलाई 2022

एक राज्य जो चलते बढ़ते ज़िला बन गया : डाॅ. परिवेश मिश्रा

1947 का वर्ष समाप्त होने में दो दिन बाकी थे। 'पद्म-विभूषण' से सम्मानित भारत के एकमात्र पुलिस अधिकारी श्री के.एफ.रुस्तमजी ने सारंगढ़ के गिरिविलास पैलेस में रहते हुए अपनी डायरी (बाद में पुस्तक के रूप में प्रकाशित) में लिखा कि सी.पी. एन्ड बरार राज्य में स्थानांतरित हो कर उत्तर-पूर्वी कोने में जिस ज़िले (रायगढ़) के एस.पी. पद का चार्ज लेने जाते हुए वे यहां तक पहुंचे थे, वह ज़िला तब तक भारतीय गणराज्य के नक्शे में ही नहीं था। 


दूसरी बात जो श्री रुस्तमजी ने लिखी : 'वे एक ऐसे राजा के मेहमान थे जिनके लिए एक राजा के रूप में ये उनके जीवन के अंतिम दो दिन थे। रूस्तमजी ने नोट किया कि राजा नरेशचन्द्र सिंह जी को राज्य जाता देख किसी किस्म का दुख या मलाल नहीं था। बल्कि अपने राज्य और यहां के लोगों के बेहतर भविष्य के लिए अपने सपनों के पूरा होने की संभावनाओं को लेकर वे बेहद आशान्वित और उत्साहित थे। 

विलय के समय अनेक राज्यों/रियासतों के पास ऐसा बहुत कुछ था जो आज एक नया ज़िला बनाने के लिए आवश्यक समझा जाता है। लेकिन सारंगढ़ की तरह अनेक राज्यों को ज़िला मुख्यालय नहीं बनाया गया। सरकार के पास संसाधनों की कमी के अलावा मुख्य कारण था इन स्थानों में जहां अनेक खूबियां मौज़ूद थीं वहीं अनेक कमियां भी थीं। 

सारंगढ़ को ही लें। खूबियों के रूप में यहां हाईकोर्ट के अलावा दीवान (अंग्रेज़ों के ज़िला मजिस्ट्रेट के समकक्ष) के रूप में एक प्रशासनिक मुखिया, शहर कोतवाल तथा थानों के साथ पुलिस बल, जेल, अस्पताल, म्युनिसिपल कमेटी, ट्रेज़री, विद्युत उत्पादन और वितरण की अपनी व्यवस्था, शिक्षा और वन जैसे सभी विभागों के अमले, सभी कुछ था। यहां तक कि उच्च मानकों के साथ काम करती हवाई पट्टी और गाॅल्फ कोर्स भी था। 

जो सबसे बड़ी कमी इन सब खूबियों पर हावी हो गयी थी : वह थी आवागमन के साधनों का अभाव। 

सारंगढ़ में रेल नहीं थी। बम्बई और कलकत्ते के बीच रेल लाईन अंग्रेज़ों की बंगाल-नागपुर-रेल्वे कम्पनी ने उन्नीसवीं सदी में बिछाई थी। अंग्रेज़ों के रेल नक्शे में रायगढ़ था सो जुड़ गया, सारंगढ़ दूर था सो छूट गया। 1948 में रायगढ़ में रेल लाईन का होना उसे ज़िला मुख्यालय बनाने के पक्ष में बड़ा कारण बना था। पुलविहीन विशाल नदियों से घिरे सारंगढ़ की सड़कों की उपयोगिता सीमित थी। रायगढ़ के अलावा राजनैतिक मुख्यालय रायपुर और संभागीय मुख्यालय बिलासपुर भी पहुंच विहीन थे। 


सारंगढ़ में अलबत्ता एक हवाई पट्टी थी। दूसरे विश्वयुद्ध में अमरीकी बमवर्षक विमान यहां ईंधन भरने उतरा करते थे। विशेषज्ञों के अनुसार तकनीकि पैमानों पर यह देश की सर्वोत्तम हवाई पट्टियों में से एक थी। किन्तु किसी नियमित व्यावसायिक सेवा के अभाव में यहां वही आ जा सकता था जिसके पास अपना स्वयं का विमान हो। 


आज एक खाते-पीते (या खाये-अघाये) युवक का सपना यदि नयी कार खरीदना है तो कतई आश्चर्य की बात नहीं। संभावना यही है कि इस व्यक्ति के दादा की प्राथमिकता दोनों वक्त की दाल-रोटी और बच्चों की शिक्षा का जुगाड़ करने की और पिता की परिवार के लिए घर बनाने की रही होगी। 


आज़ादी के शुरुआती दशकों में भारत की स्थिति दादाजी जैसी ही थी। आंखों में सपने अधिक थे, जेब में पैसे कम। दादाजी का भारत गरीब था कहना काफ़ी नहीं होगा। 1943 के बंगाल के अकाल में भुखमरी से अनुमानित तीस लाख मौते हुई थीं। उस अकाल की न तो यादें धुंधली हुई थीं न असर। ऐसी स्थिति में मितव्ययता ज़रूरी थी। खर्च की प्राथमिकताएं तय करना और भी ज़रूरी था। 

    

प्राथमिकताओं के तब के माॅडल को सारंगढ़ के उदाहरण से समझा जा सकता है। विलय के बाद राजा नरेशचन्द्र सिंह जी मध्यप्रदेश केबिनेट में मंत्री बन एक शक्तिशाली राजनेता के रूप में उभरे थे और इलाके के बारे में अकेले निर्णय लेने की स्थिति में थे। उन्होने तब ज़िला मुख्यालय की अपेक्षा इलाके के विकास को प्राथमिकता दी। "विकास" को परिभाषित करने के लिए कोई पुराना माॅडल सामने नहीं था। स्वयं का विवेक ही सहायक था। उन्होने आवागमन की अधोसंरचना और कृषि पर निवेश कर स्थानीय अर्थतंत्र को मजबूती देने और लोगों का जीवन स्तर बेहतर बनाने की जुगत को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। वैसे भी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएं यह स्थिति राज्य या देश की नहीं थी।

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2 अक्टूबर 1954 का दिन छत्तीसगढ और सारंगढ़ के सामाजिक और आर्थिक इतिहास में मील का पत्थर है। इस दिन रायपुर और सारंगढ़ के बीच आरंग नामक स्थान में महानदी पर बने मध्यप्रदेश के तब तक के सबसे लम्बे पुल का उद्घाटन हुआ था। नाम दिया गया था "गांधी पुल"। मुख्य अतिथि थे तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री (और सवा दो साल बाद बने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री) श्री कैलाश नाथ काटजू। 


इस पुल पर निवेश करने का निर्णय बहुत सोच समझ कर लिया गया था। भारत के इस भूभाग के लिए यह बहुत बड़ी और दूरगामी प्रभाव डालने वाली उपलब्धि थी। इस एक पुल ने छत्तीसगढ (पूर्वी मप्र) के लिये उड़ीसा और कलकत्ता समेत पूर्वी भारत के साथ आवागमन संभव कर यहां व्यापार और समृद्धि के द्वार चौतरफा खोल दिए थे। तब तक रायपुर राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण किन्तु सामाजिक-आर्थिक रूप से एक कस्बानुमा स्थान था। रायपुर को एक बड़े शहर का रूप देने और छत्तीसगढ में आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने में यह पुल सबसे बड़ा फैक्टर बना। 


दो वर्षों में बने इस पुल को आकार देने में जिन दो लोगों का महत्वपूर्ण रोल था उनमें पहले थे मध्यप्रदेश के रायपुर निवासी मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल। दूसरे थे उनके मंत्रिमंडल में पी.डब्लू.डी. विभाग के मंत्री सारंगढ़ के राजा नरेशचन्द्र सिंह जिनके लिए खुशी का एक स्वाभाविक अतिरिक्त कारण यह था कि सारंगढ़ पहली बार बारह-मासी सड़क के द्वारा बाहरी दुनिया से जुड़ गया था। 


आरंग वाला पुल सारंगढ़ के लिये पर्याप्त नहीं था। साठ के दशक में राजा साहब सारंगढ़ को रायगढ़ से जोड़ने वाले पुल की शासकीय स्वीकृति लेने में सफल हो गये। किन्तु उन्हे इस बात का दुख था कि दो वर्ष बीतने और स्वयं मंत्रीमंडल के प्रभावशाली सदस्य होने के बावज़ूद वे पुल का निर्माण शुरू नहीं करवा पाये थे। 


पूछने पर उन्हे हर बार एक सा जवाब मिलता : पी.डब्लू.डी. और ठेकेदार कम्पनी के बीच कुछ विवाद हैं और पत्राचार चल रहा है। यह पुल आरंग वाले से अधिक लम्बा होने जा रहा था इसलिए तकनीक के साथ साथ स्थान चयन को ले कर भी विवाद थे। महानदी में बीचों बीच एक बड़ा टापू है। उस टापू की उपयोगिता पर जितना विश्वास राजा साहब को था उतना दूसरों को नहीं हो पाया था। थक कर एक दिन उन्होने पी.डब्लू.डी. विभाग और निर्माण करने वाली गैमन इंडिया कम्पनी के उच्चाधिकारियों को सारी फ़ाईलों के साथ सारंगढ़ निमंत्रित किया। टापू पर उन्होने टेन्ट लगवाया। चाय नाश्ते और नावों की व्यवस्था भी थी। राजा साहब अपनी बेटी कमला देवी के साथ सभी मेहमानों को लेकर वहां पहुंचे। बेटी के साथ वे स्वयं नाव पर बैठे रहे। सारे अतिथि जब उतर गये तब उन्होने घोषणा की - "मैं वापस जा रहा हूं। आप लोग साथ बैठकर जी भर कर चर्चा कीजिए। जब सारे विवाद सुलझ जाएं तो रूमाल से इशारा कर दीजिएगा। मैं नाव भेज दूंगा।" राजा साहब का सामाजिक राजनैतिक रुतबा और कद इतना बड़ा था कि अधिकारियों के पास उनकी इस अजीबोगरीब घोषणा पर खेल भावना का प्रदर्शन करते हुए मुस्कराते रहने का विकल्प नहीं था। वहीं सहमति बनी कि नक्शे में बदलाव कर, दोनों किनारों के बीच स्थित उसी टापू की चट्टानों का इस्तेमाल किया जाएगा। ऊपर से एक दिखते लम्बे पुल का वजन दरअसल दो हिस्सों में बंटा होगा।  इसके बाद निर्माण में गति तो आनी ही थी। संयोग रहा कि जब यह पुल पूरा हो कर 1972 में उद्घाटित हुआ तब तक श्रीमती कमला देवी राज्य की पी.डब्लू.डी. मंत्री बन चुकी थीं। यह पुल आज भी काम कर रहा है। 


आवागमन के साथ साथ कृषि विकास भी प्राथमिकता थी। 


1954 में भारत के राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र प्रसाद राजा साहब के निमंत्रण पर दो दिवसीय दौरे पर सारंगढ़ आये। राजा साहब की इच्छा थी सारंगढ़ में एक कृषि का काॅलेज खुले। उन्हे बताया गया कि चूंकि दूर दूर तक कहीं कृषि स्कूल नहीं है इसलिए महाविद्यालय के लिये छात्र नहीं मिलेंगे। दूसरी समस्या थी कि कृषि विद्यालय हो चाहे महाविद्यालय, दोनों में छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए खेतों की आवश्यकता पड़ती है। सारंगढ़ में राजा साहब ने इसके लिए अपनी तीन सौ एकड़ भूमि दान की और राष्ट्रपति के हाथों कृषि विद्यालय का शिलान्यास हुआ। उसी समय साथ में आये मुख्यमंत्री प॔. रविशंकर शुक्ल ने प्रस्ताव को विस्तार दिया। उन्होने रायपुर के पास लाभांडी नामक गांव की अपनी कृषि भूमि दान करने का निर्णय लिया। वहां कृषि महाविद्यालय बना जिसने आगे चलकर वर्तमान इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय का रूप लिया। (सारंगढ़ में राष्ट्रपति के हाथों शुरू कृषि विद्यालय और साथ में दान में मिले खेतों का क्या हुआ यह अलग कहानी है)। 

1960 के दशक में ही सारंगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि क्रांति के रूप में तीन बड़ी सिंचाई योजनाएं आयीं। पहला बड़ा बांध था किंकारी। घने जंगलों के बीच स्वीकृति के बाद इसका भी काम शुरू नहीं हो पाया था। यहां देरी का नया कारण था। उस युग में मशीनें कम थीं। बड़ी संख्या में मजदूरों के बिना निर्माण संभव नहीं था और मजदूर उपलब्ध नहीं थे। इलाके के आदिवासी अपना घर छोड़कर कहीं जाने के आदी नहीं थे। लालच के प्रचलित तरीके काम नहीं आये थे। हाट में ज्यादातर अदला-बदली में सामान मिल जाता था। सो पैसे में इतनी ताकत नहीं थी कि जीवन शैली बदल सके। शराब वे अपनी आवश्यकतानुसार स्वयं बनाने में सक्षम थे। तब राजा नरेशचन्द्र जी ने प्रलोभन का नया तरीका इज़ाद किया। आदिवासी कल्याण के अपने मंत्रालय से सिनेमा प्रोजेक्टर और डीज़ल जेनेरेटर के साथ ऑपरेटरों की टीम को बांध की साईट पर पदस्थ करवा कर स्वयं अपने लिए भी तम्बू तनवा दिया। दिन भर काम चलता और रात में मजदूर और उनके परिवार सिनेमा देखते। फिल्में सीमित थीं। साल भर वही दो-चार फ़िल्में दोहराई जातीं रहीं और हर बार दर्शक मंत्रमुग्ध हो कर, देखते रहे। जागृति और मुन्ना जैसी फिल्में उन आदिवासियों ने इतनी बार देखीं जितनी बाद में लोगों ने मदर इंडिया, मुगलेआज़म और शोले भी नहीं देखी होंगी। जब तक बांध पूरा नहीं बना न राजा साहब का टेन्ट उखड़ा न साईट से मजदूर टस से मस हुए। यही नुस्खा उन्होने दूसरे बड़े बांध केड़ार और फिर तीसरे पुटका बांध और उनकी नहरों के लिए भी आजमाया। 1956 में बने हीराकुड बांध के कारण सारंगढ़ से लगे हिस्से में महानदी के जलस्तर को ठहराव और ऊंचाई प्राप्त हुई, भू-जल का स्तर बढ़ा, जिसने बड़े इलाके में लिफ्ट इरिगेशन संभव बनाया। 


अस्सी का दशक आते तक क्षेत्र की कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था मजबूत हुई और समृद्धि बढ़ी। इलाका मध्यप्रदेश में मूंगफली उत्पादन में टाॅप करने लगा। धान का उत्पादन तीन से चार गुना बढ़ गया। धान से चावल बनाने की दर्जनों मिलें खुल गयीं। यहां के गन्ने के बूते पड़ोस के राज्य उड़ीसा के बरगढ़ में शक्कर कारखाना चल निकला। कच्चे मकान पक्के होने लगे। एक पटाव (मंज़िल) के दो पटाव होने लगे। कृषि उपकरणों, ट्रैक्टरों और मोटरसाइकिलों की संख्या बढ़ने लगी। बाहर जाकर पोस्ट ग्रैजुएट और डाॅक्टरेट करने वाले किसान पुत्र बढ़ने लगे। 


1980 का दशक आते तक देश दादाजी से आगे बढ़कर पिताजी के काल में पहुंच गया। बढ़ते कृषि उत्पादन, व्यापार और आवागमन के साधनों का असर समाज में दिखने लगा।


किंकारी बांध से 1972 में जब नहरों में पहला पानी छोड़ा गया तब तक गांवों में दो-चार व्यक्ति ही होते थे जिनके पास कभी-कभार गांव से बाहर जाते समय पहनने के लिए सफेद धोती हुआ करती थी। (ज्यादातर राजनांदगांव के बंगाल नागपुर काॅटन मिल की बाघ-छाप धोती पहनते थे)। और साथ में गांव में बनी चमड़े की मोटी चप्पलें। बाकी का गुज़ारा हरे या नीले रंग के उस सूती कपड़े से होता था जिसे पुरुष लपेट ले तो धोती और महिला लपेटे तो लुगड़ा कहा जाता था। 1977 में लोकसभा क्षेत्र को सारंगढ़ नाम दे दिया गया था। 1980 के दशक शुरू होते तक एक जागरूक पहल पर महाविद्यालय शुरू हो गया। सूरत आदि शहरों से आने वाले सिन्थेटिक कपड़ों से दुकानें सजने लगीं। 1988 से किराये के 'कमाण्डर' वाहनों में सपरिवार यात्राएं शुरू हुईं। महानदी पर बिलासपुर के लिए भी पुल बनना शुरू हो गया। 


यही वह काल था जब सारंगढ़ को एक ज़िला बनाये जाने की संभावना एक प्रबल जन आकांक्षा का रूप लेने लगी। 

1987 में राजा साहब का निधन हो चुका था और 1996 के बाद उनकी बेटियां लोकसभा और विधानसभा से बाहर आ चुकी थीं। तब तक ज़िले का सपना देखने वालों की संख्या बढ़ने लगी थी। दादाजी का पोता बड़ा हो कर नयी कार खरीदने की स्थिति में पहुंच गया था। लोगों के सपनों की लिस्ट में रेल लाईन जुड़ चुकी थी। राजा साहब के निधन के बाद हवाई पट्टी का उपयोग कार ड्रायविंग सीखने के लिये होने लगा था। गाॅल्फ कोर्स पहले ही कृषि विद्यालय के लिए दान में जा चुका था।    


आकांक्षा पूरी होने में समय लगा। किन्तु दादाजी और पिताजी ने बुनियादी परिस्थितियां इतने आगे लाकर और मजबूत छोड़ी थीं कि पोते के सपने को नकारते जाना और न्यायोचित मांग को अनदेखा करना, किसी के लिए संभव नहीं रह गया था। 

आखिरकार 15 अगस्त 2021 के दिन छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि सारंगढ़ एक ज़िला बनेगा। यदि जनभावना को मूर्तरूप देने वाला सक्षम और समर्पित नेतृत्व मिला तो एक दिन न केवल रेल आयेगी बल्कि सारंगढ़ को नियमित हवाई मार्ग में भी स्थान प्राप्त होगा। 

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डाॅ. परिवेश मिश्रा

गिरिविलास पैलेस 

सारंगढ़ (छत्तीसगढ)

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#सारंगढ़नामा,#Sarangarhtales, #Chhattisgarhtales

सोमवार, 25 जुलाई 2022

भाजपा मंडल भेड़वन गुड़ेली एवं कोसीर का बैठक संपन्न हुआ

 


विधानसभा क्षेत्र सारंगढ़ में भाजपा मंडल भेड़वन गुड़ेली एवं कोसीर का संयुक्त कामकाजी बैठक संपन्न हुआ

माननीय श्री विजय शर्मा जी प्रभारी भाजपा जिला रायगढ़ माननीय श्री ओपी चौधरी जी(आईएएस) यूथ आईकॉन प्रदेश मंत्री भाजपा छत्तीसगढ़ माननीय श्री उमेश अग्रवाल जी जिला अध्यक्ष भाजपा जिला रायगढ़ का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। 

भारतीय जनता पार्टी मंडल कार्यसमिति का दिनांक 24 जुलाई को ग्राम रेड़ा में बैठक किया गया जिसमें बूथ कार्य विस्तार योजना एवं आजीवन सहयोग निधि की समीक्षा किया गया।आगामी कार्यक्रमों में आजादी का अमृत महोत्सव के तहत 13 अगस्त से 15 अगस्त तक सभी घरों में तिरंगा को लेकर योजना बनाया गया। भाजयुमो के आगामी कार्यक्रम विधानसभा स्तरीय एसडीएम कार्यालय का घेराव, जिला रोजगार कार्यालय का घेराव, एवं 24 अगस्त को मुख्यमंत्री निवास के घेराव को लेकर दिशा निर्देश दिया गया।                              बैठक में माननीय श्री विजय शर्मा जी जिला प्रभारी भाजपा रायगढ़, माननीय श्री ओपी चौधरी जी प्रदेश मंत्री भाजपा, माननीय श्री उमेश अग्रवाल जी जिलाध्यक्ष भाजपा, श्रीमती केराबाई मनहर जी पूर्व विधायक सारंगढ़, श्री रत्थूलाल लाल गुप्ता जी जिला मंत्री, श्री चंद्रप्रकाश बब्बल पाण्डेय जी जिला उपाध्यक्ष, श्री विकास केड़िया जी प्रदेश कार्यसमिति सदस्य युवा मोर्चा, श्री जगन्नाथ केसरवानी जी वरिष्ठ कार्यकर्ता, श्री जुगल किशोर केसरवानी जी वरिष्ठ कार्यकर्ता, श्री श्यामसुंदर रात्रे जी पूर्व अध्यक्ष कृषि उपज मंडी सारंगढ़,श्री ज्योतिलाल पटेल जी जिला उपाध्यक्ष, श्री कुलकीत चन्द्रा जी प्रदेश मंत्री किसान मोर्चा, श्री देवेन्द्र रात्रे जी मंडल अध्यक्ष भाजपा भेड़वन गुड़ेली श्री भूषण लाल चंद्रा जी मंडल अध्यक्ष कोसिर श्री रविन्द्र पटेल जी मंडल अध्यक्ष सालर मल्दा श्री दीनानाथ खूंटे जी प्रदेश कोषाध्यक्ष अजा मोर्चा श्री भारत भूषण जोल्हे जी श्री मनोज लहरे जी श्री टीकाराम पटेल जी, श्री राजेश जायसवाल जी पूर्व पार्षद श्रीमती मीराधरम जोल्हे जी, श्रीमती देव कुमारी लहरे जी, श्री अरविंद खटकर जी, श्रीमती नंदिनी वर्मा जी, श्रीमती रत्नज्योति रात्रे जी, श्री धर्मेन्द्र पटेल जी श्री हरिनाथ खुंटे जी श्री शिवम चंद्रा जी महामंत्री श्री सुखराम अनंत जी महामंत्री श्री संतोष साहू जी महामंत्री श्री जीवन रात्रे जी जिला महामंत्री अजा मोर्चा श्री मनोज जायसवाल जी पूर्व पार्षद श्री राजा गुप्ता जी जिला उपाध्यक्ष श्री मनोज लहरे जी श्री अजय देवांगन जी श्री उमाशरण तिवारी जी श्री घनश्याम साहू जी, श्री धरम अजगल्ले जी श्री रामेश्वर पुरी गोस्वामी जी श्री सुनील बघेल जी, श्री टेसराम सोनी जी, श्री अनिरुद्ध चंद्रा जी श्री डोरीलाल चंद्रा जी श्री विनय चंद्रा जी श्री बाबूलाल लहरे जी श्री लक्ष्मण निराला जी श्री मनीराम वर्मा जी श्री शोभाराम पंकज जी श्री रामप्रसाद पटेल जी, श्री मनीराम वर्मा जी जी श्री संतोष दास महंत जी श्री नारायण दास महंत जी श्री विजय पटेल जी, श्री सीताराम राणा जी, श्री टिकेश्वर लहरे जी श्री बाबूलाल लहरे जी श्री बिंदु देवी लहरे जी, श्रीमती पूनम वारे जी श्रीमती लकेश्वरी चंद्रा जी श्रीमती फूलेश्वरी महेश जी श्रीमती कंचन मेहर जी, श्रीमती शिवरात्रि मेहर जी, श्रीमती धनेश्वरी मेहर जी श्रीमती नीरा सोनी जी श्री विनय चंद्रा जी श्री डोरीलाल चंद्रा जी श्री मोहर साहू जी, श्री प्रेमलाल चंद्रा जी श्री पुरंदर लाल जोल्हे जी अध्यक्ष युवा मोर्चा श्री भनेश चौरगे जी श्री उमेश चौरगे जी श्री वेद प्रकाश रात्रे जी श्री प्रकाश जोल्हे जी श्री ललित खूंटे टे जी श्री दरस राम साहू जी, श्री परमेश्वर साहू जी, श्री शिबू चौहान जी, श्री शंकर जोल्हे जी श्री फुलेंद्र कोसले जी श्री सूरज राम पंकज जी श्री बूधनाथ गिरी जी श्री संपत लाल वर्मा जी श्री राम कुमार सिदार जी एवं सैकड़ों कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

छत्तीसगढ़ में मारवाड़ियों के आने और बसने का इतिहास : डॉ. परिवेश मिश्रा

साभार : फेेेसबुक

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक की एक सुबह सूरजमल जी अपनी पत्नी और छोटे भाई के साथ रायगढ़ से बैलगाड़ी में रवाना हुए। लगभग 17 मील दूर दो विशाल नदियों के बीच बसे चन्द्रपुर पहुंचे तो बैलगाड़ी छोड़ना पड़ी। पैदल और नाव के बाद उन्होंने यात्रा जारी रखी और सारंगढ़ पहुंचे। 

कहते भी हैं:
जहां न पहुंचे रेलगाड़ी, वहां पहुंचे बैलगाड़ी,
जहां न पहुंचे बैलगाड़ी, वहां पहुंचे मारवाड़ी. 

सारंगढ़, चन्द्रपुर या रायगढ़ इलाके में बसने के लिए आने वाला यह पहला मारवाड़ी परिवार था। 

"मारवाड़ी" शब्द जाति या भूगोल की अपेक्षा संस्कृति से अधिक जुड़ा है। राजपूताना के साथ जुड़े हरियाणा, मालवा आदि क्षेत्रों के अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल, खण्डेलवाल, पोरवाल और सरावगी आदि वैश्य के अलावा जाट, राजपूत, ब्राह्मण और अन्य जातियों के लोग भी इसी संबोधन से जाने जाते हैं। 

राजपूताने का वैश्य समुदाय अनन्त काल से पशुपालन और कृषि के साथ वाणिज्य का कार्य करता रहा है। हिम्मत, लगनशीलता, अनुशासन, विनम्रता, सहनशीलता, दूरदर्शिता, समर्पण, जोखिम उठाने का माद्दा, और इन सब से अधिक जबरदस्त आत्मविश्वास इस समुदाय की विशेषताएं रही हैं। 

मध्यकाल तक इनके इलाके में अनेक व्यापारिक मार्ग विकसित हो चुके थे। चुरू (बीकानेर राज्य), राजगढ़ (सादुलपुर) और रेनी (अलवर) जैसे बाज़ार सिंधु और गंगा नदी के मार्फत आयातित सामान से पटे रहते थे। 

इस काल में मारवाड़ियों के बंगाल पहुंचने का पहला अवसर आया था 1564 में। राजा मानसिंह अकबर की सेना लेकर युद्ध करने बिहार गये तो उन्होंने अपनी फ़ौज में मोदीखाने की जिम्मेदारी मारवाड़ी वैश्यों को दी थी। मोदी अर्थात राशन, हथियार और गोला बारूद के स्टाॅक का प्रभारी। लेकिन इस काल में कोई बड़ा सामूहिक पलायन नहीं हुआ था। "मोदी" बनकर बंगाल पहुंचने वाले मारवाड़ियों में से ही "जगत-सेठ" भी हुए। लेकिन उनकी कहानी कभी और। 

राजपूताने में मध्यकाल वाली जीवनशैली अंग्रेज़ों के आने से प्रभावित हुई। अंग्रेज़ों से पहले की व्यवस्था में अपेक्षाकृत सुरक्षित माहौल में यात्राएं और व्यापार हो जाते थे। प्रमुख व्यावसायिक मार्गों पर हर दस कोस पर सराय या धर्मशालाएं थीं, घोड़ों के खाने-पीने की व्यवस्थाएं थी। रास्ते में सुरक्षा का जिम्मा उन इलाकों के राजाओं का था जिन्हें ये व्यापारी चुंगी और कर पटाया करते थे। 

सन 1818 आते तक राजपूताने के सारे राजाओं ने अंग्रेज़ों के साथ संधि कर ली। नयी व्यवस्था में राजाओं के ख़ज़ानों से काफ़ी धन अंग्रेज़ों को जाने लगा। फ़ौजी खर्च में भारी कटौती हो गयी। सुरक्षा की जिम्मेदारी अंग्रेज़ों ने ले ली किन्तु वे मौके पर सुरक्षा देने में सफल न हो सके। राजाओं के अनेक ठिकानेदार भी थे और आमद कम होने से व्यापारियों के प्रति उनकी आर्थिक अपेक्षाएं बढ़ने लगीं थीं। इन्हीं सब के साथ व्यवसायियों की तकलीफ़ें भी बढ़ने लगी। 

इधर कलकत्ता और बम्बई के बन्दरगाहों से व्यापार का एकाधिकार ईस्ट इंडिया कम्पनी ने प्राप्त कर लिया था। अब उसे एक नेटवर्क की आवश्यकता थी जो देश के भीतरी इलाकों से सामान की खरीदी कर बंदरगाह तक पहुंचा सके और साथ ही योरोप से आए माल को देश के भीतरी भागों में पहुंचाने की व्यवस्था कर सके। 

1850 के बाद के अनेक वर्षों तक राजपूताना अवर्षा और भीषण अकाल की चपेट में आया। मारवाड़ियों के पुरखे उस काल को "छप्पनिया का अकाल" के नाम से याद करते रहे। 1860 में दिल्ली से कलकत्ता रेल लाईन प्रारम्भ हो गयी। 1874 और 1881 के बीच राजपूताने के अधिकांश महत्वपूर्ण स्थानों में रेल लाईन बिछ गयी। इन सब कारणों के इकट्ठा होने से उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में, बड़ी संख्या में मारवाड़ी बम्बई तथा अंग्रेज प्रशासित इलाकों (जैसे नागपुर राजधानी वाला सेन्ट्रल प्राॅविन्सेज़) में पहुंचे थे। लेकिन सबसे बड़ी संख्या में ये बंगाल पहुंचे। बम्बई की अपेक्षा यहां प्रतियोगी के रूप में गुजराती और पारसी का मौजूद न होना भी एक कारण था। उन दिनों ये कहावत चल निकली थी : 

उपजे ज्योंही खाते हैं, कायर क्रूर कपूत
औं परदेसा में खपे, सायर न्यार सपूत 

हमारे सूरजमल जी ऐसे ही एक मारवाड़ी थे। राजपूताने के झुंझुनू जिले में कतली नदी के किनारे एक गांव है केड़। बताते हैं इनके पूर्वजों ने सन् 1458 में इस खुली भूमि में बसने का निर्णय लिया और एक केड़ का पौधा लगाया था। कालांतर में इस गांव के लोग केड़िया उपनाम से जाने गये। इतिहास के अनुसार सारंगढ़ में पहले मारवाड़ी के पहुंचने की घटना पांच सौ वर्ष पहले की है। लेकिन वे यहां बसने नहीं आये थे, सो बस आये और चले गये। यह एक अन्य सम्पूर्ण कहानी का विषय है। 

श्री सूरजमल केड़िया का सारंगढ़ आना संयोग नहीं था। सारंगढ़ के गिरिविलास पैलेस में उपलब्ध रिकाॅर्ड बताते हैं उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में राज्य में प्रशासनिक अस्थिरता का एक दौर आया था। राजा संग्राम सिंह की मृत्यु 43 वर्षों के सफल शासन के बाद हुई थी। उनका सिर्फ कार्यकाल लम्बा रहा हो ऐसा नहीं था। मध्य और पूर्वी भारत के इस भू-भाग में उनका कद बहुत ऊंचा था। सारंगढ़ किले और नगर की स्थापना तो उनके पूर्वज राजा रतन सिंह ने कर दी थी किन्तु आधुनिक सारंगढ़ को शहर के रूप में बसाने और उसकी आर्थिक उन्नति की पुख्ता व्यवस्था करने का पूरा श्रेय राजा संग्राम सिंह को जाता है। 1857 के आस-पास के वर्षों में इलाके के गोंड और बिंझवार राजाओं और जमींदारों ने जब अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह किया तो नेतृत्व करने वालों में राजा संग्राम सिंह अग्रिम पंक्ति में थे। सम्बलपुर के वीर सुरेन्द्र साय और सोनाखान के वीर नारायण सिंह की कहानियां इसी दौर की हैं। 

राजा संग्राम सिंह की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठे राजा भवानी सिंह और राजा रघुवर सिंह की मृत्यु बहुत कम अंतराल में हो गयी थी। 1890 में राजा रघुवर सिंह के बेटे जवाहिर सिंह को जब राजा के पद पर आसीन किया गया तो उनकी उम्र मात्र एक वर्ष नौ महीना थी। 

अस्त-व्यस्त प्रशासनिक माहौल का सीधा असर राज्य की आर्थिक स्थिति पर पड़ा था और इस बात ने अंग्रेज़ों को बहुत चिंतित कर दिया था। उनका एकमात्र ध्येय था राज्य से राजस्व की वसूली जिसे वे नज़राना कहते थे। आर्थिक अव्यवस्था उनकी आमदनी प्रभावित करती थी। शिशु राजा जवाहिर सिंह को कुछ ही वर्षों में औपचारिक शिक्षा के लिए रायपुर के राजकुमार काॅलेज में भेज दिया गया। सारंगढ़ राज्य की व्यवस्था देख रहीं उनकी दादी बोधकुमारी देवी की सहायता के लिए अंग्रेज़ों ने एक सुपरिटेंडेंट के साथ अधिकारियों का अमला पदस्थ कर दिया था। 'एकाउन्टेन्सी' फिर भी एक समस्या रही। राजा संग्राम सिंह के समय का बही खाता और दैनन्दिनी लेखन अंग्रेज़ समझ नहीं पाते थे। अंत में निर्णय लिया गया कि अंग्रेज़ी एकाउंटिंग से वाकिफ़ किसी व्यक्ति को यह काम सौंपा जाए। किन्तु यह आसान नहीं था। बही-खाते के कार्य में तब तक मारवाड़ी अपनी पकड़ का लोहा मनवा चुके थे किन्तु अधिकांश मारवाड़ी 'देश' से अपना पारम्परिक पाटी-गणित सीखकर कलकत्ता पहुंचते थे और यह गणित अंग्रेज़ों को कभी समझ नहीं आया था। किसी ऐसे मारवाड़ी की तलाश शुरू हुई जिसकी थोड़ी-बहुत वाकफ़ियत अंग्रेज़ी एकाउन्टेन्सी से हो। 

खबर कलकत्ता भेजी गयी। उन दिनों कलकत्ता की बड़ी मारवाड़ी फर्मों में झुंझुनू ज़िले के चिड़ावा की एक फर्म थी "नन्दराम बैजनाथ केड़िया"। इनका मुख्य व्यापार जूट से बने टाट का था और वे पटसन निर्यात करने वाले सारंगढ़-रायगढ़ इलाके से वाकिफ़ थे। जूट का कारोबार उन दिनों अंग्रेज़ों के हाथ से सरक कर मारवाड़ियों के हाथ आना शुरू हो गया था। यहीं से निकल कर सूरजमल जी ने सारंगढ़ आने का निर्णय लिया था। 

सारंगढ़ में इन्हें "ख़जांची" का पदनाम मिला। सबसे महत्वपूर्ण: बात रही कि इनके माध्यम से मारवाड़ियों को इस इलाके में सुरक्षित माहौल में व्यवसाय करने का अघोषित अभयदान मिला। 

बीसवीं सदी के पहले दशक में राजा जवाहिर सिंह ने राजा के रूप में काम काज सम्भाल लिया और एक बेहद कुशल प्रशासक साबित हुए। उन्होंने मारवाड़ी समेत वणिक परिवारों को आने के लिए प्रोत्साहित किया तथा व्यवसाय के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित कीं। आजकल इसे  "ईज़ ऑफ डूईंग बिज़नेस " कहा जाता है। 

सारंगढ़ से पटसन (जूट), चावल, हाथ के बुने सूती तथा कोसा कपड़े, बरेजों से पान, कपास, बीड़ी, चिरौंजी, महुआ, तेंदूपत्ता का निर्यात होता था। सूत, तम्बाखू कृषि के मामूली औजार आदि आयात होने वाली मुख्य वस्तुएं थीं। अफ़ीम और गांजे का व्यापार अंग्रेज़ों ने अपने हाथों में रखा था। 

सूरजमल जी स्टेट की नौकरी में रहे और निःसंतान रहे। उनके भाई श्री बृन्दावन केड़िया ने व्यापार किया।
बृन्दावन केड़िया जी के वंशजों के आज भरे पूरे परिवार हैं। देखते देखते केड़ के पास चिड़ावा गांव से सीताराम जी (इनके वंशजों में वर्तमान नगरपालिका अध्यक्ष श्री अमित और बड़े भाई श्री नन्दकिशोर अग्रवाल आदि हैं), बाबूलाल जी (श्री रामअवतार तथा श्री पवन अग्रवाल के परिवार) तथा हनुमान प्रसाद जी आ गये। पास के गांव सुल्ताना के सागरमल जी भी आये (इनके वंशज श्री हनुमान और श्री घनश्याम तथा दोनों के पिता श्री रामदास हैं तथा यह परिवार सुल्तानिया कहलाता है। सागरमल जी ने शुरुआत में सूत आयात कर उसकी रंगाई का काम हाथ में लिया। यह काम उन उपक्रमों में से एक था जिनसे सारंगढ़ में बुनकरी को बहुत बढ़ावा मिला। सारंगढ़ नगर में कोष्टा तथा ग्रामीण क्षेत्रों में गांड़ा, पैनका आदि जातियों में बुनकरी बड़ा उद्यम रहा है।1970-80 के दशक तक सारंगढ़ के ग्रामीण अंचलों में सिर्फ दो रंग दिखते थे - हरा और नीला। महिलाएं इन्हीं रंगों का लुगड़ा (साड़ी) और पुरुष घुटनों तक की धोती पहनते थे। एक जोड़ा खरीद लें तो सदियों नहीं फटता है ऐसी यहां के बुने कपड़े की रेपुटेशन थी। इलाके में सूरत की मिलों में बनी सिन्थेटिक साड़ियों का प्रवेश नव-ब्याहता बहुओं के माध्यम से ही हुआ।) 

शुरुआती पांच परिवार बीसवीं सदी के पहले दशक तक बस चुके थे। उन्नीस सौ चालीस के दशक में बृन्दावन जी के बेटे जयदेव प्रसाद केड़िया जी के साथ उसी कुटुम्ब के और परिवार साथ आए : श्री शिवभगवान और श्री बंशीधर केड़िया (श्री नत्थूलाल केड़िया) आये, माखनलालजी आये। और उसके बाद सिलसिला चल निकला। श्री नन्दकिशोर केजरीवाल के पिता आये। अन्य परिवार आये। 

समय बीतता गया। आज पुराने सारंगढ राज्य के शहरी और ग्रामीण इलाकों में लगभग तीन सौ मारवाड़ी वैश्य परिवार निवास करते हैं। खान-पान और पूजा-पाठ की परम्पराएं अनेक मारवाड़ी ब्राह्मणों को भी खींच लायी हैं। 

लगभग इसी काल में रायगढ़, चन्द्रपुर, खरसिया, लैलूंगा आदि स्थानों में मारवाड़ी पहुंचे। केसरवानी यहां पहले आ गये थे। गुजराती, पारसी, और कच्छी पहुंचे। सबने यहां व्यवसाय, उद्योग और राजनीति में उपलब्धियां हासिल कीं। सबकी अपनी अपनी कहानी हैं। लेकिन उनके बारे में आगे लिखूंगा। 

डाॅ. परिवेश मिश्रा
गिरिविलास पैलेस
सारंगढ़ (छत्तीसगढ़)

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

केडार में भाजपा मंडल कार्यसमिति की बैठक सम्पन्न

सारंगढ़ -: आज विधानसभा क्षेत्र सारंगढ़ के केड़ार मंडल में भारतीय जनता पार्टी का कार्यसमिति की  बैठक ग्राम पंचायत भवन छिंद में सम्पन्न हुआ। जिसमे बैठक प्रभारी के रुप में दीनानाथ खूंटे प्रदेश कोषाध्यक्ष अजा मोर्चा उपस्थित रहे। बैठक में दीनानाथ खूंटे जी ने छत्तीसगढ़ में बरदाना की कमी को लेकर राज्य सरकार के ऊपर निशाना साधा एवं बैठक में उपस्थित कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुवे कहा कि किसानों को परेशान करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने बारदाने की व्यवस्था नही की है इस बात को जनता समझ रही है । हमे किसानों के साथ खड़ा रहना है, डॉ रमन सिंह जी की सरकार में किसान सुखी और संपन्न थे। आज भुपेश जी की सरकार मैं किसानों को कई समस्याओं से गुजरना पड़ रहा है। हमे बूथ स्तर पर भाजपा की केंद्र सरकार के जनकल्याणकारी योजनाओं को पहुँचाना है, इसकेलिए शक्ति केंद्र को सक्रिय कर बूथ लेवल पर काम करने की जरूरत है। 

 


आज के इस कामकाजी बैठक में मंडल अध्यक्ष चिंताराम साहू , दीनानाथ खूंटे प्रदेश कोषाध्यक्ष अजा मोर्चा छत्तीसगढ़ एवं बैठक प्रभारी, मंडल महामंत्री रमेश तिवारी,बरतराम साहू जिला सह-कोषाध्यक्ष पिछड़ा वर्ग मोर्चा, रामरतन साहू जिला कार्यसमिति सदस्य किसान मोर्चा,देवेंद्र रात्रे मंडल अध्यक्ष भेड़वन-गुड़ेली,साहेब राम साहू जिला कार्यसमिति सदस्य, भुनेश्वर चन्द्रा कोसीर मंडल, रामाधार साहू,जयसिंह, रैपाल साहू,उदित राम साहू,जयसिंह सिदार, रामाधीन साहू उपाध्यक्ष भाजयुमो,देवकुमार जाटवर आईटी सेल संयोजक,द्वय महामंत्री भाजयुमो ईश्वर साहू, खिलेश साहू, झगेंद्र साहू कोषाध्यक्ष भाजयुमो,लोचन साहू, महादेव, अनुज कुमार जायसाल मंत्री भाजयुमो, बजरंग साहू,कन्हैया निषाद,वीरेंद्र हरिप्रिय,प्रमोद यादव सहित कार्यकर्ता उपस्थित रहे।